समत्वं योग उच्यते | कविता समत्वं योग उच्यते संतुलित मन ही सच्चा योग — एक काव्य अभिव्यक्ति लेखक: अव्यक्त तारीख: 01.12.2025 समत्वं योग उच्यते सुख-दुःख में जो स्थिर रहता, वही योगी कहलाता है, लाभ-हानि, जय-पराजय में, जिसका मन न डगमगाता है। समत्व ही है योग का सार, गीता का अमर उपदेश, संतुलन में ही छिपा है जीवन, यही है साधना विशेष। न हर्ष में उन्मत्त हो, न विषाद में हो व्याकुल, समभाव से जो जी सके, वही है जीवन का असली मूल। @अव्यक्त, 01.12.2025 इस कविता को साझा करें और मन के संतुलन का अभ्यास करें — यही योग का सच्चा मार्ग।
आत्मोत्थान सर्वोपरि: आध्यात्मिक मार्ग के 9 आईआईटी अभियंता पथिक आत्मोत्थान सर्वोपरि: आध्यात्मिक मार्ग के 9 आईआईटी अभियंता पथिक कॉर्पोरेट सफलता से आत्मिक शांति की ओर प्रेरक यात्रा स्वामी मुकुंदानंद (आई आई टी दिल्ली, परिवर्तन वर्ष 1985, तत्कालीन आयु ~25 वर्ष) कॉर्पोरेट जीवन की संभावनाओं से भरे युवा मुकुंदानंद जी ने आई आई टी दिल्ली और आईआईएम कोलकाता से शिक्षा प्राप्त की थी। लेकिन उनके भीतर एक गहरी पुकार थी—एक ऐसी पुकार जो उन्हें योग, ध्यान और आत्मिक सेवा की ओर खींच रही थी। 1985 में उन्होंने सब कुछ छोड़कर सन्यास लिया और जेकेयोग की स्थापना की। आज वे अमेरिका और भारत में हजारों लोगों को जीवन के संतुलन और आत्मिक विकास का मार्ग दिखा रहे हैं। गौरांग दास (आई आई टी मुंबई, परिवर्तन वर्ष 1993, तत्कालीन आयु ~22 वर्ष) गौरांग दास जी ने आई आई टी मुंबई से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। लेकिन उनका मन भक्ति की ओर आकर्षित था। 1993 में उन्होंने इस्कॉन से जुड़कर कृष्ण भक्ति को अपना जीवन बना लिया। उन्होंने भक्ति को पर्यावरणीय स...