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समत्वं योग उच्यते

समत्वं योग उच्यते | कविता समत्वं योग उच्यते संतुलित मन ही सच्चा योग — एक काव्य अभिव्यक्ति लेखक: अव्यक्त तारीख: 01.12.2025 समत्वं योग उच्यते सुख-दुःख में जो स्थिर रहता, वही योगी कहलाता है, लाभ-हानि, जय-पराजय में, जिसका मन न डगमगाता है। समत्व ही है योग का सार, गीता का अमर उपदेश, संतुलन में ही छिपा है जीवन, यही है साधना विशेष। न हर्ष में उन्मत्त हो, न विषाद में हो व्याकुल, समभाव से जो जी सके, वही है जीवन का असली मूल। @अव्यक्त, 01.12.2025 इस कविता को साझा करें और मन के संतुलन का अभ्यास करें — यही योग का सच्चा मार्ग।